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Hymn No. 1817 | Date: 16-Jun-2000
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घटा छायी है ऐसी, जो हर लेती है मन को।
घटा छायी है ऐसी, जो हर लेती है मन को।
नजरें हटाने का करता नहीं मन, संवारा है रूप तूने ऐसा।
कुछ अजीब सा होता है, समझ नही आता कुछ दिल को।
जिधर देखूँ उधर बहती है, प्यार की ठंडी लहर।
सिहर उठता है रोम – रोम मेरा, तेरे प्यार में भीगके।
सुध – बूध खोके करना चाहता हूँ, प्यार यार में तुझे।
पहले ढुंढ़ना पड़ता था, अब तो करे हर कन् चुगली तेरे होने की।
जानम जो न समझा था, वो समझ आने लगा दिल को।
हटती नहीं नजर अब कुछ पे से भी, जब दिख जाता है तू।
अगर में चरम है तो होने देना मेरा साथ बार – बार परम्।


- डॉ.संतोष सिंह