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Hymn No. 1822 | Date: 18-Jun-2000
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दिलदार होता है क्या प्यार, न हो पता तो कैसे करुँगा प्यार।
दिलदार होता है क्या प्यार, न हो पता तो कैसे करुँगा प्यार।
सुना है मिट जाता है इसमे भान, जीते जी फनाह होके हों जाते है एक जान।
अपने औकात से परे, बहुत चाहा पर कर न पाया एक बार ऐसा प्यार।
हाँ किया कृत – कृत तूने कई बार, बिठाके दीवानो की महफिल में।
फरियाद इसे ना समझना तू मेरी, हाँ कहता हूँ अपने मन की बात।
कभी – कभार तरस उठता है दिल, भुलाके सब कुछ प्यार करने को।
डर जाता हूँ अपने आपको जानके, कहीं मेरी गलती से घट न जाये तेरा मान।
चुपके से निहारके हो जाता हूँ खुश, प्रियतम् क्या न करना चाहूँ तेरे वास्ते।
अगर तेरा कहर सह न पाऊँ और तेरा प्यार शायद मेरे वश की बात नहीं।
नमूना हूँ संसार में सबसे बड़ा अपनी किसीम का, ढूंढ़ डालों पाओंगे नहीं मेरे सिवाय।
परम् को पाके बदलता है हर कन्, पर मैं हूँ इक् ऐसा जिनके लिये गया गुजरा है शब्द बना।
मैं खुश न कर सका तुझे तो हकदार न हूँ तेरे दिल को दुखाने को मजा में आये जो तू वो कर।


- डॉ.संतोष सिंह