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Hymn No. 1826 | Date: 23-Jun-2000
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तलाश हो गयी है पूरी, पर दूरी ना मिटी है मन की।
तलाश हो गयी है पूरी, पर दूरी ना मिटी है मन की।
जिंदगी तेरे नाम कर दी है, पर इच्छाये ना मरी है मेरी।
दोहरे जीवन से कब का उकता चुका हूँ, पर न आया प्यार करना।
दीवानों के महफिल में बहुत रहा साथ, पर न आया तू हाथ।
आनंद में गुजारी कई सुबहो – शाम , पर न छायी मस्ती प्यार की।
तेरी किश्ती पे तो संवार हो लिया, पर भटका मन हर मोड़ पे।
मेरा हाल बद् से भी बुरा रहा, पर तेरा ख्याल तो न मिटा।
मंजिल की ओर बढ़ते हुये बार – बार गिरा, पर उठके तेरी ओर चला।
घत है इस नामाकूल को, थोड़ा कुछ होने पे गिड़गिढ़ाने लगा तुझसे।
खुदा ये तेरा चमत्कार है, मर्द के वेष में क्या तूने जनाने को बसाया।


- डॉ.संतोष सिंह