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Hymn No. 1827 | Date: 24-Jun-2000
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ऐ नाथो के नाथ, तेरे सिवाय कौंन सम्भाले इस अनाथ को।
ऐ नाथो के नाथ, तेरे सिवाय कौंन सम्भाले इस अनाथ को।
गुणों से धनीं मिलेगे अनेंक शिष्य, मुरखाई से भरा बस एक मैं।
तेरे सिवाय जाऊँ कहाँ मैं, किसको अपना रोपे हॉल सुनाऊँगा।
मेरे पास न है ऐसा कुछ, रिझाके लुभालूँ तेरे दिल को।
समर्थ इतना भी नहीं कर सकूँ सेवा, फिर भी अढ़ा रहूंगा रात दिन कदमों में तेरे।
तेरी चाकरी ही है मेरी साधना, तुझे निहारना होगा मेरी आराधना।
हौले – हौले कदमों को तेरे दाबते हो जाउँगा मगन दिल ही दिल में।
डटा रहूंगा बिना थके जी जान से तेरी सेवा में, मौका मिलते करुँगा सेवा गुरू भाइयों की।
मन में इकतरफा भाव तेरे प्रति, उठे ना कोई और बेबात।
भावो में झूमते हुये, रमता रहूंगा होके मस्त तेरी चाकरी में।


- डॉ.संतोष सिंह