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Hymn No. 1828 | Date: 25-Jun-2000
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ऐ मन अब तू मानं भी जा कि तेरी बहुत।
ऐ मन अब तू मानं भी जा कि तेरी बहुत।
आड़े न आ मेरे प्रभु के बीच में, हो चुका समय तेरा पुरा।
रह ना गयी अब तेरी जरूरत, जो जरूरत मेरी बदल गयी।
यॉरी तो भी बहुत पुरानी, पर दोहरानी है वो कहानी।
साथ चाहता है तो ढलना होगा तुझे मेरे अनुरूप।
मेरा कहाँ न करके, करना होगा प्रभु का कहा।
मिटके बदला तू कई बार, इस बार बदलना है बिन् मिटे।
पराकाष्ठा होगी पुरूषार्थ की, आशीष पायेगा प्रभु से।
कुछ भी ना है असम्भव, जो इक् बार ठांना वो तो है होना।
कर्ता होके अकर्ता बनके कर, तब फल के रूप का न है मतलब।


- डॉ.संतोष सिंह