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Hymn No. 1830 | Date: 28-Jun-2000
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मान न मान मैं तेरा शिष्य, रहूंगा पीछे पड़ा नित्य।
मान न मान मैं तेरा शिष्य, रहूंगा पीछे पड़ा नित्य।
कह दे चाहे जो कुछ भी तू, मुझको तो चाहिये साथ तेरा।
औरों कि न करता हूँ बात, वे सब है अपने आप मैं श्रेष्ठ।
नालायक हूँ मैं सबसे बड़ा कुछ न करते हुये आस रखूं बड़ी – बड़ी।
अपने किसीका का अकेला हूँ, सरताजों के पीछे बेहंइयाँ में बड़ा।
बिन् कुछ किये, जुड़ा रहना चाहता हूँ साथ तेरे।
माना ऐसा हो नहीं सकता, तेरे पीछे जीवन से हाथ धोने को हूँ तैयार।
फेरफार करना होगा मेरे भीतर, तुझको आकार देने के वास्ते।
दम न है कीमत चुकाने की, फिर भी हूँ तैयार कुछ भी कर जाने के लिये।
सयाना न हूँ इतना कर जाऊँ दम पे अपने, हाँ तेरी कृपा से कर डालूंगा।


- डॉ.संतोष सिंह