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Hymn No. 1831 | Date: 28-Jun-2000
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मत दोहराना तो वो खेल पुराना, जिसपे जाने पे हो पछताना।
मत दोहराना तो वो खेल पुराना, जिसपे जाने पे हो पछताना।
अपनी करनी पड़ती है भुगतनी, चाहे बदल कितना भी तू।
रस्म है अनोखी पड़ती है सबको निभानी, चाहे हो वो कोई भी।
वो अलग बात है प्यार के जोश में, हमको होश न हो होने का कुछ।
धोना पड़ता है जीवन से हाथ, समझके जो न मानी बात तू।
दातो तले दबा लेती है दुनिया ऊंगलियाँ, जब ज्ञानके आंच में तपके निकलता है तू।
बड़ा मुश्किल रहता है बयाँ करना हालात वो, रह जाती है तब अनुभूती।
हर अवस्था में छाया रहता है दिल पे दीवानगी का जुनून।
प्यार तो कब किसपे आ जाये, जब मिट जाये भेद दिल का।
खिल जाता है तू कमल के समान, मस्ती में झुमते हुये लिप्त रहके रहे अलिप्त।


- डॉ.संतोष सिंह