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Hymn No. 1833 | Date: 29-Jun-2000
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अनजान हम अपने करमों से, गुहार लगाये कुछ कर दिखाने के वास्ते।
अनजान हम अपने करमों से, गुहार लगाये कुछ कर दिखाने के वास्ते।
बिखेर रखा है राह पे इच्छारूपी कांटों को, तुझसे निष्कंटक मार्ग बनाने को।
मन के अथाह समुंदर में फैलाया है जाल वासनाओं का, तुझसे कहते है बचा ले तू हमको।
अपना बोया काटना पड़ता है सबको इक् दिन, बबूल होके आम कि करते है हम मिन्नत।
दावा बड़े – बड़े करते है तुझको छलावा में रखने के वास्ते, चार दिन कर नहीं पाते तेरा कहा।
आशाओं का हृदय में रहता है ज्वार, पुरूषार्थ के अभाव में दावा ठोकते है फल पे।
बातें तो करतें हें दलदल से उबरने की, मौका मिलते भागते है बिन् सोचे – समझे।
आता नहीं जो फिर भी बतलाते है उसपे, अपने अज्ञान को बक् बक् करके बधारते है ज्ञान की शेंखी।
देखा देखी से बाज नहीं आते, नकल में भी चाहिये अकल विकलता में जाते है भूल।
देखा जाये तो हूँ राह की धुल, छूके चरणों को तेरे करता हूँ मुकूट बनने की भूल।


- डॉ.संतोष सिंह