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Hymn No. 180 | Date: 16-Jun-1998
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आनंद के सिवाय कुछ नहीं है इस दुनिया में, सुख दुख में भी तो एक आनंद है,
आनंद के सिवाय कुछ नहीं है इस दुनिया में, सुख दुख में भी तो एक आनंद है,
रोना – हँसना, आना – जाना इनका सबका भी तो इक् आनंद है ।
इक् बार तू जोड लें खुद को परम् सच्चिदानंद से, तो तू जान जायेगा क्या आनंद है;
खुद से खुद को उससे ना ही कोई जोड पाया; जिसने जुडने की सच्ची चाह दिखायी
वह यूँ ही जुडता चला गया।
दुनियादारी को तू छोड, कर ले उसकी चाकरी, फिर देख हर पल तेरी मौज ही मौज है ।
तू ना देह, इस देह का आनंद क्षणभर के लिये है, तन – मन की थकान को भूल के
ले ले तू शरण उसकी ।
भरण – पोषण वहीं करता है हम सबका, और किसी के किये कुछ भी न होता है;
बनाना और मिटाना उसकी माया का है खेल, बदलता है सिर्फ रूप, तेरे संग सदा वो रहता है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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दिल गुनगुनाने लगता है जब नजर आती है तेरी छवि,
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