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Hymn No. 1841 | Date: 02-Jul-2000
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बड़ी मुश्किल हो जाती है जब बन जाता है गवाह संसार सारा तेरे होने का।
बड़ी मुश्किल हो जाती है जब बन जाता है गवाह संसार सारा तेरे होने का।
हालत तब देखने जैसी होती है मेरी, कुछ का कुछ समझके समझ नहीं पाता हूँ।
ज्ञान सारा का सारा धरा – का धरा रह जाता है, प्रेम पे पड़ जाता है परदा बेसुधी का।
दोष में तुझको कैसे दूं, जब सच्चाई को जानके स्वीकार न कर पाता है मन।
जब – जब कुछ ठाना मन ने, तब – तब कुछ उससे उलटा पाया तेरे स्वरूपों को।
देखके खेल तेरा हो उठती है आर्द्र आँखें, चीत्कार कर उठता हूं प्रभु कितना मजबूर करता हूँ।
हमको माया के पंजे से छुढ़ाने के वास्ते, तू न जाने कितने तरह के स्वांग रचाता है।
हम भी कितने बड़े है निष्ठुर, अपने कर्मों का भार उठाते देखके प्रेम भी तेरा कहाँ ना है करते।
चपत की आदत पड़ी है पुरानी, लातों के भूत प्यार भरी बातों से कैसे मानेंगे तेरी बात।
दावा तो नहीं करता, पर अब मजबूर करने लगा दिल तेरा कहाँ कर दिखाने को।


- डॉ.संतोष सिंह