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Hymn No. 1844 | Date: 04-Jul-2000
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कातील धटा छायी हुयी है न जाने कब कहाँ बरस जाये।
कातील धटा छायी हुयी है न जाने कब कहाँ बरस जाये।
कोई भेद न रखे किसीसे, सबको कर जाये तरबता एकसा।
कोई रहता है बचने की फिराक में, कोई उठाये लेकर भीगने का।
बरसाना उसका काम है, मजा उसके नाम पे लेना हमारा काम।
दाम लेता न है वो किसीसे, मजा का जाम पीना है हमारा काम।
नजरों का भेद है, जैसा दिल वैसा भाव लेता है हिलोर।
कोई उठाये लुफ्त बरखा बहार का, कोई बिताये नागवारी में दिन।
बेचैन रहता है हमारा मन न ही दुनिया का कोई और पहलू।
मन मोर के भाँति नाचे, हर्षित होता है अंग का रोम रोम।
जीवन के हर सोपान में छुपी है खुशियाँ, लुफ्त उठाना आना चाहिये।
- डॉ.संतोष सिंह
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