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Hymn No. 1845 | Date: 04-Jul-2000
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इसा के खेत में आया हूँ बनके आदमखोर, कई बार लिया प्राण तेरा।
इसा के खेत में आया हूँ बनके आदमखोर, कई बार लिया प्राण तेरा।
फिर भी बुलाये तू पास अपने, करतूतों से मैं न आऊँ बाज अपने।
झूठ का सहारा लेके करता हूँ प्रयास तुझे फुसलाने का।
फिर भी साम्यता है तेरे – मेरे बीच में, एक ही रूप होके रुप है बहुतेरे।
मैं भी हूँ कुछ ऐसा, धोर तो करता हूँ कुछ करम, उसपे से निकम्मा।
प्रभु भी जीत लेते है दुर्गुणो को, पर जीत नहीं पाते निकम्मे को।
तू चाहता है कुछ करने को, हम देते नहीं मौका तुझे कर पाने का।
समर्थ परम हो जाता है असमर्थ, हम जैसे निकम्मों के सामने।
फिर भी कुछ ऐसा होता है, जो तू बांधे रखता है अपने आप से।
इक् बार नहीं कई बार दोहराऊँगा मुझ जैसे का है तू तारनहार।


- डॉ.संतोष सिंह