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Hymn No. 1846 | Date: 05-Jul-2000
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माना प्रियतम् तू सुनता है हमारी, पर करते है हम अपने मन की।
माना प्रियतम् तू सुनता है हमारी, पर करते है हम अपने मन की।
आँसू देखके मेरे न करना कोई हेर – फेर, समय आने पे ठहराता है तू सही।
भाँप नहीं पाता हूँ और, बह जाता हूँ अपने सड़ी – गली रौ में।
क्या है सही – क्या है गलत मेरे वास्ते, तुझसे जियादा मैं नहीं जानता।
करना – करवाना सब कुछ तुझे है, पड़ी न है इस निकम्मे को कुछ।
मेरी बात कोई तू न रखना, माना हाल दिल का है तू जानता फिर भी कहला लेना।
तनिक इतना चाहता हूँ अगर तू मानता है, जो भी करवाना करते जाऊँ दिल से।
खिल उठे तन – मन मेरा कहाँ करने से, मिट जाये मन की सारी हिचक।
गचकाती रही है यहीं बात कई बार, यार मेरे अब न तू फिर गचके देना।
जीयाँ जीवन कई बार बनके मैं, मिटाकें इसे बनके तेरा तू जी लेने देना।


- डॉ.संतोष सिंह