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Hymn No. 1847 | Date: 05-Jul-2000
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बरसें अखियाँ बरखा के समा, गाहे – बगाहे तुझे याद – कर करके।
बरसें अखियाँ बरखा के समा, गाहे – बगाहे तुझे याद – कर करके।
मनाऊँ जश्न अपनी बरबादियों पे, दिल महसूस करे जब तेरे प्यार को।
यार बड़ा अनोखा है हाल मेरा, खुद ही खा जाता हूँ धोखा हाल देखके मेरा।
कैसे निकलूंगा इस जहालत से, जो मिटने ना दे तेरे मेरे बीच की दूरी को।
मैं तो तेरे संग सुर से सुर मिलाके गाना चाहता हूँ गीत अमर प्रेम का।
जिंदा होते हुये बन गया हूँ लाश के समान, जब अच्छा – बुरे का भाव नहीं आता।
आनंद की न है कमी तेरी कृपा से, पर व्यवहारिकता में लगती है मुरखाई दुनिया को।
अरे सांवरे – संलोने किस कारन से तूने मेरी ये गत बनायी।
सौंपना चाहता हूँ तेरे हाथों में खुद को, जो न होने दे मुझसे।
मेरा मर्ज तेरे सिवाय न जाने कोई, इसका ईलाज तेरे सिवाय कर ना सके कोई।


- डॉ.संतोष सिंह