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Hymn No. 1848 | Date: 06-Jul-2000
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डूब जाने दे तेरी प्रेम सुधा में, न जाने मिलेगा मौका कब ऐसा।
डूब जाने दे तेरी प्रेम सुधा में, न जाने मिलेगा मौका कब ऐसा।
चौंका देना चाहता हूँ तेरे दिल को, कीचड़ रूपी मन में खिल जाये तेरे प्यार का कमल।
तिरता रहूंगा बाहें फैलाये अनंत आसमा के नीचे खो के ख्यालों में तेरे।
मस्ती में रहूंगा इतना चूर, जीवन की कठिनाइयाँ रहके – रहेगी मुझसे दूर।
समझे कोई न समझ पायेगा, दिलवाले ही जानेगे दिलवाली की हालत।
सारी जहालतों के बीच में, परवानगी भरे अंदाज में प्यार का इजहार करता फिरूंगा।
जो कोई भी लगायेगा इलजाम, तहे दिल से करुँगा कबूल तेरे प्यार में।
होशों हवास में ठकरा दूँगा दुनिया की सल्तनत, डूबे हूये दिल को न कबूल है कुछ सिवाय तेरे।
तेरे रंग में रंगकें भरपूर करुँगा प्यार तुझसे, मिट जायेगी रही सही दूरी।
चाहके भी कोई न कर पायेंगा अलग, न ही खुद को ढूंड़ पाऊँगा।
- डॉ.संतोष सिंह
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