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Hymn No. 1850 | Date: 07-Jul-2000
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मत पूछ अब तू क्या न लगता है मेरा, सुनके जायेगा चौक तू।
मत पूछ अब तू क्या न लगता है मेरा, सुनके जायेगा चौक तू।
सीने में तू दिलबर बनके रहता है, बेचैन मन का है चैन तू।
अंखियों का है तू रैन, रहती है नैना पथराई सी तेरे बिना।
अंतर में गूंजने वाला गीत है तू, निरंतर बजनें वाला संगीत है तू।
रास रचाने वाला है छलिया तू, दर – दर भटकाने वाला ललन् है तू।
अपने अनुपम प्रेम में भाव – विभोर करके करता है मजबूर थिरकने के लिये।
जो भी नाता है किसी से उसमें पाता हूँ मैं तुझे, दुनिया का दाता है तू।
अघाता न है दिल तुझसे, तेरे प्रेम में डूब जाता है मन।
मेरे रोम – रोम में रमता है तू, तेरे बिन दिल को न है कुछ जमता।
अब बता तेरे – मेरे बीच कौन सा नाता है, जो बताऊँ मैं तुझे।
- डॉ.संतोष सिंह
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कुछ भी कह ले, तेरे कहने को न माना गलत कभी।
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