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Hymn No. 1852 | Date: 09-Jul-2000
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निकम्मे के घर जन्मा है पुरूषार्थी, अप्रितम पिता की कृपा से।
निकम्मे के घर जन्मा है पुरूषार्थी, अप्रितम पिता की कृपा से।
आया है जीवन का नया रंग सिखाने, प्रेम रंग में रंग के।
अंग – अंग है कमल के समान, निर्मलता बसी हुयी है दिल में।
भेजा था हम सबको कुछ कर जाने के वास्ते, भुलाके उसको डूबे राग – रंग में।
दंग हो गयी हमारी करनी देखके, सह न सका हमारीं विचित्र हालत को।
उबारने के वास्ते भेज दिया अपने दिल के टुकड़े को पास हमारे।
पता कर ना सकूंगा उसकी व्यवस्था, करवा लेना तू हमारे हाथों से।
सिध्द का पिता बन गया तेरी कृपा से, पर रह गया अभी तक असिध्द।
भद् पिटवायी अपनी कई बार, तब दौड़के चरणों में हुआँ करबध्द तेरे।
आबध्द कर ले अपने दिल से इतना, तेरा कहाँ कर जाऊँ होके लयबध्द।
- डॉ.संतोष सिंह
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रह नहीं जाता कुछ सोचने को, जब कह देते है कुछ मेरे गुरू।
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