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Hymn No. 1856 | Date: 11-Jul-2000
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शरम का नाटक बहुत बार खेला इस बेशर्म ने।
शरम का नाटक बहुत बार खेला इस बेशर्म ने।
वादे कई बार किये, हर बार थोड़ा झूठा बनके हमने।
प्यार का दावा किया, धोखा देके दिल को लगाया कही और।
भीतर उजास की बात करके, फैलाये रखा मन में अंधेरा भ्रम का।
नाम तो तेरा लिया, पर बेचैन रहा किसी और के लिये।
याद तो बहुत किया, पर फरियाद को पूरी करवाने के वास्ते।
आँसू तो बहुत बहाये, शरमा जाये इनको देखके घड़ियाल भी।
कितना भी कहाँ तूने जुड़ने की बात करके, जुड़ने का न काम किया।
हर आरोप है सच्चा, मुझपे, पर रहना चाहूँ साथ तेरे।
देना जो भी सजा लूंगा भुगत मैं, तेरे वास्ते तेरी कृपा के सहारे।


- डॉ.संतोष सिंह