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Hymn No. 1857 | Date: 12-Jul-2000
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मैं कुछ ना सोंच सकता हूँ सिवाय तेरे।
मैं कुछ ना सोंच सकता हूँ सिवाय तेरे।
तेरे प्यार की आग बदल चुकी है दावानल में।
किस क्षण हो जाऊँगा भस्मीभूत मुझे न है खबर।
परवाह न है कुछ होने का, इंतजारी में हूँ हो जाने के।
चैन होके बेंचैन है मेरा मन, जो न जुड़े जब तक तुझसे।
अस्वीकार कर तू किंतनी बार, करना पड़ेगा तुझे स्वीकार।
प्रस्फुटित हुआ है मेरे दिल में जो तेरे प्यार का अंकुर।
प्यार की तपिश से न दूँगा मुरझाने उसे कभी।
श्रध्दा के होंगे आँसू बना देंगे मजबूर फलने – फूलने से उसे।
जो न हुआँ है बदलेंगे यत्नों से प्रभु तेरी कृपा लेके।


- डॉ.संतोष सिंह