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Hymn No. 1859 | Date: 13-Jul-2000
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कहते हुये आती है शर्म, जब तेरा बताया धर्म पाते नहीं निभा।
कहते हुये आती है शर्म, जब तेरा बताया धर्म पाते नहीं निभा।
पुरूषार्थी को माना है मुरम, उनपे बरसाये अपनी प्यार भरी कृपा।
आँखे मिंचमिचाके बैठना कुछ और, दायित्वों को निभाना है सबसे अहम।
जिम्मेंदारीयों से मुख मोड़ना है पाप, मशगूल होके करते जाना है भक्तों की पहचान।
इससे बड़ा न कोई है काम, सचमुच वो तो है प्रभु हृदय का जान।
करता नहीं कुछ वो अपने वास्ते, करता हें औरों के लिये प्रभु का कहा हुआ मानके।
जो भी दोष है सब बाहर में, अंतर में प्रभु के सिवाय ना है किसीका वाश।
सोंच सकते हो होनां है ऐसा दुष्कर, पर सचमुच में न है कोई मुश्किल।
पाया है तन न जाने कितने योनियों में भटक के, अब ना निकम्मा बनके है अटकना।
पीछे का सिखायाँ रह जाता है धरा, जब मन के संग नाचे – नाच भाँति भाति के।


- डॉ.संतोष सिंह