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Hymn No. 1860 | Date: 13-Jul-2000
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चाहता हूँ जानना अपने बारे में, अगर हो तेरी स्वीकृती।
चाहता हूँ जानना अपने बारे में, अगर हो तेरी स्वीकृती।
ऐसा क्या किया था जो जलना पड़ रहा है विरह की आग में।
वो कौन सा कारन था, जो दूर रखे हुये तुझको – मुझसे।
पहुचाया है दुख तेरे दिल को, प्रायश्चित् में क्याँ है करना।
बिन डरे तेरे प्यार को कैसे पाऊँगा, रमे हुये अपने धून में।
तेरा – मेरा क्या नाता है, जो जोड़ हुये है मुझको – तुझसे।
फरमाइशे ना है कोई नयी करनी, चाहे तो तू मिटा दे पुरानी।
जो बात अब तक ना बनी, उसके पीछे क्या है कहानी।
जानने से अगर बदलता हें जीवन तेरे वास्ते तो तू ना कर देंर अब।
अगर हित में है न जानंना, तो कर दें मसरुफ दिल को तेरे प्यार में।


- डॉ.संतोष सिंह