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Hymn No. 1861 | Date: 14-Jul-2000
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क्या न करता तू हमारे वास्ते, लुटाये अपने आपको हर पल।
क्या न करता तू हमारे वास्ते, लुटाये अपने आपको हर पल।
अपनापन है इतना भूलते है गैर होना, सौंपता है तू सर्वोत्कृष्ट अपना।
करीब – करीब जानते है सब, फिर भी लगाते नहीं दिल रब तुझमे।
रोते है रोना फरियादो का, भूले से करते नहीं प्रवेश प्यार के ख्वाबों में।
ताब रहती है कुछ पाने की, कुछ कर दिखाना चाहते नहीं कभी।
आजाद होने की बात करते नहीं, पर मोंह से नाता तोड़ते नहीं।
कभी कुछ करने से न किया मना तू, पर वृत्तियों का किया विरोध।
प्रवृत्ति में ना है निवृत्ति, निवृत्ति में बाहें फैलाये है तू खड़ा।
सब कुछ हो सकता है, चाहे तो क्या न कर सकते बात बतायी तूने।
फिर भी ना रहना सीखे दुनिया में, जिन जुड़े जुड़ना परे रहके तेरे पास रहना।


- डॉ.संतोष सिंह