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Hymn No. 1862 | Date: 14-Jul-2000
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प्यार की आग धधक रही है भीतर, दे दे तू उसको दिया।
प्यार की आग धधक रही है भीतर, दे दे तू उसको दिया।
पिघलानां चाहता हूँ तेरे दिल को, खींच लानें के वास्ते पास अपने।
खुद जलके किसी और को न जलाऊँ, जहाँ में काम करूँ रोशनी का।
फूटी कौड़ी की न है कीमत, फिर भी चाहता हूँ पिता तेरी रहमत।
कर्मो का है दोष मेरा, फिर भी चाहता हूँ पिता तेरी कृपा।
माना कई बार भटका राह से, हर बार लाया राह पे तूने।
तोहमत लगाता न किसी पे, अभिशाप के केंचूल को उतार देना चाहूँ।
खाक कर देना चाहूँ प्यार की आग पे तन – मन के ढेर को।
रह न जाये कुछ शेष्, आसान हो जायेगा तुझमे प्रवेश करना।
- डॉ.संतोष सिंह
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