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Hymn No. 1867 | Date: 16-Jul-2000
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होगा ना कोई मेरे जैसा पापी, जिसको मिले ना गुरू – गुरूपूर्णिमा में।
होगा ना कोई मेरे जैसा पापी, जिसको मिले ना गुरू – गुरूपूर्णिमा में।
कितना किया हूँ दुःखी अपने प्रियतम को, लेना पड़ा जो ऐसा कठोर निर्णय।
आज तो दोर गुरू चरणों में सबकों, मेरा मन रह जाये गुरू के इर्द - गिर्द घूमके।
बताना चाहता हूँ दर्द दिल का, ऐसा क्या हो गया जो गंवारा ना हुआ सूरत देखना मेरी।
अहोभाग्य है उनका, जिनको हुआ दीदार आज के दिन गुरू का।
सोच रहाँ मैं हूँ कितना बड़ा खल – कामीं, देनी पड़ी प्रिय को ऐसी सजा।
माफ तू बिलकूल न करना, न जाने कितनी बार दुःखाया है तेरे दिल को।
मेरी जगह होता अगर कोई और या तो कहा तेरा करता या मर जाता चुल्लु भर पानी में।
मेरे कारन् – गुरूवर को देनी अपने प्रियतम शिष्यों को भी सजा।
प्रभु अब तो है एक ही रजा, मुझे ना सहीं कर दे तू पूरी उनके मन की कहीं ।


- डॉ.संतोष सिंह