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Hymn No. 1869 | Date: 16-Jul-2000
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कहाँ से लाऊँ इतना सुंदर दिल, जो कर दे मजबूर तुझे कहा करने को।
कहाँ से लाऊँ इतना सुंदर दिल, जो कर दे मजबूर तुझे कहा करने को।
कैसे बनाऊँ मन को इतना निर्मल, जो करे दीदार तेरा जब चाहे तब।
रब मैं हूँ झूठ का पुतला, तो क्या मेरे ख्वाब न होगे पूरे इस जनम में।
ताब तो रखता हूँ बहुत, पर तेरे सामने आते ही हो जाता हूँ फुस्स।
दुष्टताई तो भरी है रग – रग में, पर किसी कोने में तेरी चाहत छवी पड़ी है।
अपने किये पे पछताता हूँ बहुत, फिर भी उसी राह पे बह जाता हूँ।
मेरे दोषों का न ले इलजाम तेरे ऊपर, उसका सरा दारमोदार है मेरा।
हर पाप का घड़ा फूटता है, पापो से लबारेज इस धड़े को अब तू फोड़ दे।
जो न कर पा रहा हूँ कहा तेरा, जगह निकलने पे हो जाये वो यूँ ही।
मजबूर मैं हूँ, मजबूर न बनना तू, पर मेरे दिल की बात सुनना तू जरूर।


- डॉ.संतोष सिंह