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Hymn No. 183 | Date: 19-Jun-1998
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हर बार कुछ न कुछ ऐसा कर देता हूँ, अंजाने में बन जाता हूँ जग हँसाई का पात्र मैं,
हर बार कुछ न कुछ ऐसा कर देता हूँ, अंजाने में बन जाता हूँ जग हँसाई का पात्र मैं,
यूँ ही तो मैं हर बात पे अपने आप पे हँसता रहता हूँ ।
जो दुनिया वाले हँसते है मुझपे, उनका हँसना नहीं लगता है मुझको बूरा,
खुद भी तो मैं हँसता रहता हूँ लोगो को देख – देखके ।
उबर जाना है इक् दिन तेरे आशीर्वाद से सब कुछ देना है भुला;
याद रह जाना है तू और सिर्फ तेरा नाम, खो जाना है उसी में ।
धीरे – धीरे अहसास अब सिर्फ तेरे पास होने का होता है;
अपने लोग भी पराये से लगते है, तू दूर रहके भी पास रहता है ।
पाना और खोना मेरे हिस्से का जो कुछ भी है वो तो हो चुका है तेरा;
सुख दुख का अहसास ना होता है, ना ही तेरे करीब होने का न ही तुझसे दूर जाने का।


- डॉ.संतोष सिंह