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Hymn No. 184 | Date: 20-Jun-1998
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सिर्फ अन्न – जल छोडने से उसे कोई पा नहीं सकता ।
सिर्फ अन्न – जल छोडने से उसे कोई पा नहीं सकता ।
घर – बार से दूर भाग के कोई उसके निकट जा नहीं सकता ।
प्रेम के बिन् हर त्याग है झूठा; खुद से रूठने से –
दुनिया से दूर भागने से तू उसे पा नहीं सकता ।
बिन मर्जी के उसके ना ही तू उसके करीब जा सकता है
अन्न – जल ग्रहण करके भी नहीं ग्रहण करना पड़ेगा उसे पाने के लिये,
दुनिया में रहके भी दुनिया छोडनी पड़ेगी उसके साथ रहने के लिये ।
अपनी प्यारी सी प्यार को उसके चरणों में सौंपना पड़ेगा,
हर पल उसके संग जी के दिखलाना पड़ेगा बिन उसके
मन के हर मैल को मिटाकें सबको अपनाना पड़ेगा,
हर स्वार्थ को छोडके निस्वार्थ प्रेम से पूजना होगा ।
जतन किया हुआ अपना सर्वस्व उसपे लुटाना होगा ।


- डॉ.संतोष सिंह