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Hymn No. 188 | Date: 26-Jun-1998
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मन की करता है तू हम सबके, अब हम चाहते है तू कर अपने मन की,
मन की करता है तू हम सबके, अब हम चाहते है तू कर अपने मन की,
हमारा मन बंधा होता है तन की इच्छाओं से हम खुद को नहीं है पहचानते ।
हर छोटी – बड़ी चीज पानें के लिये, है मचलते बच्चों की तरह, फिर खुदही उसमें बंध जाते है;
दूर नहीं रख पाते है अपने आपको विषय – वासनाओं से, पाके उनमें ही गुम हो जाते है ।
अब हम अपनी ठोर तेरे हाथों में है सौंपते जैसे भी तू ढालेगा वैसा ही हम ढल जायेगे ।
चाहने लगे है हम तूझे, इस भीड़ भरी दुनिया में तेरा साथ खोजते है ।
अब हम सबसे दूर भागते है, बस तेरे पास आना चाहते है ।
भुला देना चाहते है खुदकों, तुझमें ही खो जाना चाहते है ।
मैं वादा तो नहीं करता हूँ, पर फरियाद तुझसे हर पल करूंगा ।
तू जो चाहे वहीं करूँगा, जीवन का हर पल तेरा नाम लेके जिऊँगा ।


- डॉ.संतोष सिंह