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Hymn No. 1931 | Date: 10-Aug-2000
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है। गोंसाई तू जाने मनवा की हर बार को, तो क्यों ना हर मेरे भीतर के संताप को।
है। गोंसाई तू जाने मनवा की हर बार को, तो क्यों ना हर मेरे भीतर के संताप को।
तेरी प्रताप का डंका बाजे तीनों लोक में, उसके आगे कहाँ किसी और की कोई बिसात।
मैं तो आया हूँ तेरे पास लेके ना कोई फरियाद, मिटाना चाहता हूँ भीतर के फसाद को।
इस अंतर में बसाना चाहता हूँ तुझको, अगर ये लोभ है तो मंजूर है मुझको।
इसके वास्ते अगर कोई सजा नियत कर रखी हो, तो वो भी दिल से है कबूल।
डर – डरके जीने से अच्छा है इक् बार को मर जाना, बार-बार को प्यार करने से अच्छा है फिदा हो जाना।
माना की बहुत कुछ न है भाग्य में, फिर भी अहोभाग्य है मेरा जो मिला तू इस जनम में।
तेरी मर्जी तू जाने कर तू उसके मुताबिक, कसम है मुझे भी यूं न जाने दूँगा हाथों से तुझे।
नामाकूल हूँ जरूर पर तेरे प्यार ने काबिल बना दिया, तेरे लिये कुछ कर गुजर जाने के वास्ते।
तुझको सदा किया है प्रणाम, पर तेरे मेरे बीच आयी अगर तेरी मर्जी तू चलने ना दूंगा उसे।
- डॉ.संतोष सिंह
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