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Hymn No. 195 | Date: 01-Jul-1998
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ऐ पिता तू ये बता कब तक चलेगी, आँख – मिचौली का खेल तेरे – मेरे बीच ;
ऐ पिता तू ये बता कब तक चलेगी, आँख – मिचौली का खेल तेरे – मेरे बीच ;
कब तक तू छुपता रहेगा, घट – घट में, मैं भटकता फिरूंगा, तूझे खोजने के लिये दर – दर।
इसमें तेरी मंशा क्या है, क्यों तू छुपता फिरता है हमसे, बाँध रखी है माया की पट्टी –
हमारी आँखों पे ।
तेरे नाम के सहारे दर – बदर की ठोकरें खाते हुये, तूझे ढूँढते – फिरते है हम ।
यह मायावी खेल – खेलता है तू हमशा सदियों से, पास बुला – बुलाके तू भरमा जाता है।
हर रिश्ता – नाता तू हमशें जोडता है, फिर क्यों हमको छोड जाता है ।
तू चाहे तो सहज बुला ले हमें पास अपने, ना होने दे जुदा हमको अपने आप से।
अज्ञानी है हम, अपने अज्ञान को सत्य समझते है, उसके सहारे तूझे ढुँढते फिरते है ।
दोष ना तेरा है, ना ही हमारा, ये तो खेल है कर्मों के लुका – छिपी का।
कभी तो तू यूँ ही मिल जाता है, और कभी तन छिल जाता है, फिर भी ना मिलता है तू।
सदियों से ये खेल तू खेलता आ रहा है; और खेलता रहेगा ।
तन बदल जायेगा, नाम बदल जायेगा, खेलने वाले हम और तूम वहीं के वहीं रहेगे।


- डॉ.संतोष सिंह