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Hymn No. 197 | Date: 07-Jul-1998
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मुझे यहाँ मिल रहा है सब कुछ, जो स्वर्ग में भी नहीं मिलता ।
मुझे यहाँ मिल रहा है सब कुछ, जो स्वर्ग में भी नहीं मिलता ।
वहाँ अच्छा – बुरा कोई कर्म ना होता है; निष्काम होके सब कुछ होता है ।
गम और खुशी में कोई भेद ना है, हर कोई गम में भी है मुस्कुराता;
हर कोई महफूज रहता है उसमें, बिन् अपने कर्म से विमुख हुये ।
तन से रहते है सब उससे जुदा – जुदा, पर मन से हर कोई है जुड़ा उससे ।
कुछ कहने की जरूरत ना रहती है उससे; दिल ही दिल में हर सवाल का
जवाब मिलता है ।
मुरझाये हुये फूल भी खिल उठते है, करीब जाके उसके;
जिन सीनों में गमों का सैलाब रहता है, वो भी झूमनें लगते है प्यार पाके उसके,
उसकी हर बात इतनी अनोखी है, फिर भी वो शांत सरल सा रहता है
अधरों पे रहती है उसके मुस्कान् कमल के समान, खिलखिलाता है बच्चों की तरह,
हमारे अंदर छुपे हुये अपने अंश को जगाता है हौले - हौले;
मुस्कुराके दुनियादारी के हर पहलू के संग जीके, सबको गले लगाना सीखात है हमको।


- डॉ.संतोष सिंह