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Hymn No. 2040 | Date: 18-Oct-2000
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मिलते ही तुझसे खिल जाता हूँ, तुझसे दूर रहने पे रहता नहीं आपे में।
मिलते ही तुझसे खिल जाता हूँ, तुझसे दूर रहने पे रहता नहीं आपे में।
सारे सपनों के ताने बाने बन गये है इर्द गिर्द तेरे, निकल जाये तू तो कुछ नहीं है।
आज भले बेमानी लगती हो मेरी बातें, पर होता जा रहा हूँ धीरे – धीरे रूमानी तेरे प्यार में।
फर्क बहुत है मेरे कहने – करने में, पर तेरे पास रहते – रहते रमता जा रहा हूँ प्यार के रंग में।
ढंग होगा जैसा भी मेरे जीने का, पर तेरे प्यार को लिये घूमता हूँ सीने में।
मुस्कराता रहा हूँ जीवन के हर पलों में, पर अब तो छायी रहती है खुशगवारी सीने में।
कौन है जब कुछ सोचता, अब तो तेरे पास रहते – रहते चौंक उठता हूँ जब आती है कुछ सोंच मन में।
रुचता था पहले सब कुछ थोड़ा बहुत, पर अब तो किसपे कहाँ आ जाये दिल जो कर दे छेड़छाड़ तू
भीड़ भाड़ से रहा न कोई मतलब, भीड़ - भाड़ में दिलाता रहता है तू अपनी याद सदा।
सदा कर नहीं सकता तेरा कर्ज कभी, हाँ आजन्म गुजार देना चाहता हूँ तेरी दासता में जनमों जनम ।
- डॉ.संतोष सिंह
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बहुत कुछ तुझसे कहना है, बहुत कुछ तुझसे सुनना है।
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दिन ढल जाये रात गुजर जाये, खत्म न हो कभी तेरी प्यार भरी बाते।
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