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Hymn No. 2045 | Date: 24-Oct-2000
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मेरी तड़प – तड़प नहीं, मेरा प्यार प्यार ही कहाँ, जो दिल ही न पास मेरे।
मेरी तड़प – तड़प नहीं, मेरा प्यार प्यार ही कहाँ, जो दिल ही न पास मेरे।
इंसा के रूप में जानवर मैं, इक् बार नहीं न जाने कितनी बार छला तुझे।
तेरे पास रहके रहा न साथ, इच्छाओं का संग धरके चाहा साथ तेरा।
दास मैं कामनाओं का, नमुना चाहा तेरे पास मन ने छोड़ा सदा साथ।
हाथ में था तू फैलाया कही और, शऊर न था कुछ का चाहा सब कुछ।
रब धोखा दिया तुझे, बताया खाया है धोखा खूद, जुदा रहके लिप्त रहा घोर कर्म में।
आँसू बहे बहुत पर मगरमच्छ की तरह, मिला नहीं तो है अंगूर खट्टे।
दूजों का करके अपमान लगाया दाग तुझपे, तेरा नाम लेके करना चाहा नाम अपने।
जो न स्वप्न में सोचा था वो काम करके तेरा सर झुकाया शर्मिंन्दिगी से।
बदलता रहा है सारा संसार प्यार में तेरे, यहाँ तो बात बात में बट्टा लगाया नाम पे।


- डॉ.संतोष सिंह