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Hymn No. 2046 | Date: 24-Oct-2000
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ऐं मेरे मौला ऐसा क्या किया, जो धूला मेरे प्यार में जहर।
ऐं मेरे मौला ऐसा क्या किया, जो धूला मेरे प्यार में जहर।
पहले नजरों से पिला देता था, अब तो तरसाता है तू हर पल।
ऐसा क्या हुआ जो तू इतना हिला, मजबूर हुआ देने को ऐसा सिला।
गिला कम न है अपने आप से, कैसे जिंदा हूँ तुझसे दूर रहके।
ऐसा न है कहना – किया तूने वास्ते मेरे कुछ, जो भी है दिया हूआँ है तेरा।
पर जतन न करना सीखा कभी, बढ़ता रहा पतन की औरं हर पल।
है चारों और दल – दल मेरे, डूबना या तिरना सब कुछ है कबूल जो तेरी मर्जी से।
बनना चाहा तेरे प्यार का दर्दी, कर्मों से बनंता गया बेदर्दी।
बेमुरव्वत न हो तू मुझसे, तेरे बगैर न कबूल कुछ भी हमको।
इच्छाओ को भुलाके पूरा करना चाहता हूँ तेरे दिये उत्तरदायीत्वों को।


- डॉ.संतोष सिंह