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Hymn No. 2049 | Date: 25-Oct-2000
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सुनो – सुनो मेरी कथा, जो बनते जा रही है तेरी वियोग में व्यथा।
सुनो – सुनो मेरी कथा, जो बनते जा रही है तेरी वियोग में व्यथा।
आहत होता रहता हूँ हर पल, पर उसमें भी आता है हमको मजा।
देनी थी तो देता कोई और सजा, तेरी हर सजा है सर माथे पे।
इसमे दोष नहीं, कोई कभी न था तेरा, ये तो है खेल कर्मों का।
मैं कोसता नहीं इस जेल को, कैसा भी हो इसी कारण तो हुआ मेल।
अब तो आस कहो या इच्छा, मिट जाना चाहता हूँ प्यार के इस खेल में।
हो जाये दिलों का ऐसा मेल, फिर न हो मिलके बिछुड़ने का खेल।
कहने सुनने से परे कहे जाये सारी बातें दिल ही दिल में तुझसे।
तेरे वास्ते हम कुछ न है तो क्या, हमारे वास्ते है तू सब कुछ सदा से।
देर हुयी जो खुदको भुलाके, बिगड़ा बनाना चाहता हूँ तुझमें रमके।


- डॉ.संतोष सिंह