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Hymn No. 2053 | Date: 30-Oct-2000
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लगी है आग सीने में, जो जीने नहीं देती हमको।
लगी है आग सीने में, जो जीने नहीं देती हमको।
जलाती है रात दिन, फिर भी खाक होने नहीं देती।
कसूरवार है दोनों तो सजा इक् को क्यूँ है मिलती।
सजा तो झेल जायेगे, पर मिलके तड़प क्यूँ नहीं मिटती।
जब दामन में थे दाग इतने हमारे, तो करीब क्यूँ बुलाया।
आधे – अधुरे मोहब्बत की, दास्ताँ बनाके, तूने हमको क्यूं सुनाया।
भूली बिसरी का नाम लेके तूने क्यूँ होने दिया विस्मृत ।
जब दिल ही न था पास हमारे, तो क्यूँ प्यार करने दिया।
सर से पाँव तक ऐतराज का पुतला था, तो क्यूँ आने दिया पास तेरे।
सनम जनमो जनम का सिला था मिलन, तो क्यूँ न प्यार होने दिया।


- डॉ.संतोष सिंह