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My Divine Blessing
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Hymn No. 2066 | Date: 09-Nov-2000
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तेरी दुनिया और तू है बड़ी अजीब, रहके एक दूसरे के करीब रहती है दूर।
तेरी दुनिया और तू है बड़ी अजीब, रहके एक दूसरे के करीब रहती है दूर।
जो लगता है वो होता नही, जलती है जलाती है नये नये कारणों के खान से।
तेरे अस्तित्व से है वो और तू भी पहुँचाना जाये चाहे संसार में उसके अस्तित्व से।
कितना अजीब मेल है बेमेल एक दूसरे के, पर पूर्व और बचपन से आदि हो गये है इक दूजे के।
देखा जाय तो ना है जरूरत कुछ की, पर पूर्व और बचपन से आदि हो गई है इक दूजे के।
आनंदमय साक्षात स्वरूप है तेरा, पूर्वाग्रहो के चलते हम बदल जाते है क्षणभगूरों में।
मन का मोर नाच उठता है इच्छाओ से लिप्त होके, सुप्त पड़ जात है तब चैतन्यमय स्वरुप।
जानके अनजान बन गये, साधना से भटके के साधन बन गये साधनों के पीछे।
मन को लगा बैठे मनमाने कर्मों में, मूल धर्म को भुलाके बन गये लीक के फकीर हम।
मीरा कबीर को ना समझके अपनी समझ को समझा बैठे दुनियावी तौर तरीके को।
- डॉ.संतोष सिंह
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