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Hymn No. 2077 | Date: 16-Nov-2000
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खाना बदोशों की जिंदगी जिया अब तक, ठौर बनना चाहता हूँ तेरे धर में।
खाना बदोशों की जिंदगी जिया अब तक, ठौर बनना चाहता हूँ तेरे धर में।
एतराज ना करना खड़ा तू, मेरा दिल मान चुका है आखरी पडाव तेरे घर को।
माना मुकाम नजर आ गया है, पर अभी है बहुत दूर मंजिल।
न जाने कितने जन्मों से ठगता रहा है मायावी मृगतृष्णा के जाल बिछा बिछाके।
बिन सुधारे रूपूंगा ना अब की बार, मौत आके न कर पायेगी कुछ।
बहुत हो गया प्रारब्ध का खेल, इस बार टूटेंगी हर जेल प्यार से।
आवारगी भरा जिया हूँ जीवन, कोई चाहके ना बिगाड़ सकता मेरा कुछ।
ऐ अकाल पीया है तेरे प्यार का घूँट, हमने भी खाली ना मरने की कसम।
छुडा लूंगा मैं पीछा रहके जग में सबसे, डग - डगपे होगा आलम मस्ती का।
मजबूर होगा तू तेरे दिल के हाथों विभोर हो उठेगा देखके तू प्यार मेरा।


- डॉ.संतोष सिंह