VIEW HYMN

Hymn No. 2078 | Date: 16-Nov-2000
Text Size
मेरे वास्ते ये संसार होके भी नहीं है, हो सकता है ये मेरा पागलपन।
मेरे वास्ते ये संसार होके भी नहीं है, हो सकता है ये मेरा पागलपन।
सच्च पुंछो तो अंतर भाता नहीं मन को, सच्च और झुंठ के बीच का।
खेल है ये शब्दों का, जिसको स्वरूप दिया माया ने हमारे मन के भ्रम से।
रंगी हुयी है एक ही रंग में दुनिया, फिर भी पहचान नहीं पाता मैं।
जाने वालों का मजाक उड़ाते, उनके कर्मों के पीछे खोटी बुध्दि है दौड़ाते।
अनायास मौका मिलता है जब सद्गुरू की कृपा से, तो उसका मर्म भी जो पहचान पाते।
हाथ में आया हुआ मौका भी गंवाते, अपने जीवन को इक् और दाँव पे है लगाते।
तोड़ा होगा स्वयम के हाथों इस मायाजाल को, तब ही वो बरसायेगा अनुपम कृपा।
हाथ पकडके ले जायेगा परमात्मा के दिव्य स्वरूप को दिखाने को निर्बाध गति से।
तड़प उठेगा भीतर से मिलन के वास्ते, होगा आनंद का चिर अहसास रोम रोम में।


- डॉ.संतोष सिंह