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Hymn No. 2083 | Date: 23-Nov-2000
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वृंदावन की निकुंज गलियों में रचा ले फिर से इक बार रास ओ घनश्याम।
वृंदावन की निकुंज गलियों में रचा ले फिर से इक बार रास ओ घनश्याम।
मगन हो जायेगा ये जग सारा, देखते देखते समा जायेगा दिल में तू हमारे।
तरसते अधर गा उठेंगे गीत प्रणय के तुझको रिझाने के वास्ते।
हर कदम होगा मजबूर थिरकने को, जब जब तू छेड़ेगा बांसुरी की मधुर तान।
क्या कोई नर या वर हर कोई भूला बैठेगा अपनी सीमा डूबके तुझमे।
दौड़ पड़ेगा गिरी वन शहर गांव गांव के कोने कोने से, रास रचाने के वास्ते।
किलोल कर उठेंगे पाखी, बिन मौंसम के बयार बहने लगेगी नंदन कानन में।
प्यार की प्यार और मुखरित हो उठेगी, किसीको किसीका ना कोई ख्याल होगा।
जमुना छोड़के अपनी सीमा बड़ने लगेगी इक बार फिर से तेरे पग को चुमने को
कहते है दोहराता है इतिहास अपने आपको, और तू ना टाले अपने दास की बातको।


- डॉ.संतोष सिंह