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Hymn No. 2093 | Date: 05-Dec-2000
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दिल की अतुल गहराईयों से निकले नाम तेरा, जो पिलाया तूने जाम मोहब्बत का।
दिल की अतुल गहराईयों से निकले नाम तेरा, जो पिलाया तूने जाम मोहब्बत का।
ढल रहा है पल पल उतरने की बजाय चढ़ता जा रहा हूँ सुरूर तेरी मोहब्बत का।
कुछ न था जरूरी मोहब्बत में तेरे, जो बन गये गैर जरूरी हम।
दंग था अपने आपको देखके, कैसे धीरे धीरे रंगता चला गया मोहब्बत में।
तेरे मोहब्बत से भरी सोहबत इतनी भायी, पीछो छुड़ाने लगा अपने साये से।
खाये जाये हर पल मुझे एक ही बात, क्या कर दूं कुछ ऐसा कुर्बान तेरी मोहब्बत पे।
तेरे ख्वाबों से नाता जोड़ के, जगाना चाहता अपने अंतर में सोयी हुई मोहब्बत को।
झेला बहुत कुछ झेल पाऊँगा जमाने को, झेल न पाऊँगा पल भर को तेरा वियोग।
खेल ले तू मेरे साथ कितना भी, न करूंगा कोई शिकवा, पर न करना मोहब्बत का नाटक।
बह उठते है अश्क चाहे गम हो या खुशीं, पर मर्जी तेरी हो तो रहता है दिल को सकून।


- डॉ.संतोष सिंह