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Hymn No. 2094 | Date: 06-Dec-2000
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जानना चाहता है मेरा दिल, ऐसी कौन सी खता थी जो देनी पडी तुझे ऐसी सजा।
जानना चाहता है मेरा दिल, ऐसी कौन सी खता थी जो देनी पडी तुझे ऐसी सजा।
बेसजा हो जाता है मेरा दिल, जब सब कुछ पास होते हुये रहता है उदास मन।
कही खोखला तो नही प्यार मेरा, जो जगा न पाये दर्द दिल में तेरे।
सिहर उठता हूँ रातों को, जब तुझसे दूर होते हुये देखता हूँ ख्वाबों में।
समझ नहीं आता ऐसा क्या किया था, जो अब तक हम ना हो सके तेरे।
इसमें कोई दो राय नहीं कसूरवार होऊँगा मैं जरूर तेरा, पर नागवारी झेल नहीं पाये दिल मेरा।
खिलने के मौसम में मुरझा गया जो तो बिना सावन के कैसे बहेगी बयार।
जी जान से हो जाना चाहता हूँ तेरा, तेरे मेरे का कर दे खेल खत्म तू।
अनायास भेंट न चढ़ता चाहता हूँ भूत की सूली पे, कर लेने दे प्यार तू मुझे वर्तमान में।
जो बोया था वो काट लिया बहुत, पर अब अंतर में छिपे प्यार को मुखरित हो जाने दे।


- डॉ.संतोष सिंह