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Hymn No. 2097 | Date: 10-Dec-2000
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मुझे नहीं पता क्या होगा हाल जालीम तेरा।
मुझे नहीं पता क्या होगा हाल जालीम तेरा।
इल्जाम देना आसान है अंजाम तक पहुँचाना मुश्किल।
दिया है सर ओखली में तो परवाह नहीं टूटे होने का।
तू मत डर अपना दामन दागदार होने से, इल्जाम न लगायेगे तुझ पर।
माना ये है खेल कर्मों का, तू बेहिचक पालन करना नियम अपना।
जानम तुझे जब अपना हैं माना, डूबेंगे कितना भी गर्त में न आने देंगे आँच तुझपे।
ऐ मेरे सरताज तू तो है बेफिक्री का सरताज, इस अदने की क्या है औकात।
कबूलात तेरी हर बात करूँ या न करुँ, बेदिल वाले का दिल है तेरे पास।
घाव करना तन पे पड़े छाप इसकी मन पे महफूज होके निभाऊँ धरम तेरा।
भटके हुये को राह पे लाने वास्ते जो करेगा तू उसको सर झुका के करूंगा कबूल।


- डॉ.संतोष सिंह