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Hymn No. 2102 | Date: 21-Dec-2000
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इम्तहां लेता है हर पल तू हमारा, चूक करते करते बेचूक बनना है सिखाता।
इम्तहां लेता है हर पल तू हमारा, चूक करते करते बेचूक बनना है सिखाता।
सता सताके जीवन को समरस बनाके, जीना सिखाता है गुरेज ना करे तू किसीसे।
मांग करता है तू पूरी, पर प्रयत्नों को कराके सही अवसर आने पे।
तोड़ता है हमारे झूठे मान को अपमान से परे अंतर के शान को समझाये तू।
बरसाये कृपा तू चुपके - चुपके, नजरों में नजर डालके प्रेम का बीज बोये चित्त पे।
सारी खताये माफ कर देता है, जो देख ले सच्चा पश्चाताप तू दिल में।
अपने पराये जो भी मिले सबको एक समान नजरों से देखना सिखाये तू।
दाल गलने ना देता है तू, झूठ और द्वेषपूर्ण मिथक हो चाहे कितने भी पुराने।
भाँप न पाये कोई भी तुझे, अटकल अगर कोई भी लगाये तो कुछ और कर के काट देता है तू।
सारी सत्ता को धता बताके, अंतर की सत्ता को देता है तू महत्व निभाते हुये दुनियादारी को।
- डॉ.संतोष सिंह
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