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Hymn No. 2105 | Date: 23-Dec-2000
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महत्व वालों के बीच में महत्वहीनों का न कोई काम है।
महत्व वालों के बीच में महत्वहीनों का न कोई काम है।
जो बिन मतलब के रोते है उनके आसुओं का न कोई मोल है।
झूठे है उनके हर शब्द पे तो अपने आप से रूठे हुये होते है।
कितना भी कर दो, जिंदा दिल वालों के आगे वो लाश है।
दास कोई क्या बनायेगा, वे तो अपने इच्छाओं के साकार दास है।
कैसे कर पायेगा कोई मदद, निराशाओं से डूबे हुओं से फेर लेता है मुंह प्रभु भी।
जन्म दर जन्म बदलते रहे राख में, फिर भी न बुझी भौतिकता की प्यास।
ऐ संसार के उजले हिस्सों, इस दिलजले का है सलाम तुम्हारे पुरुषार्थ को।
ऐ मालिक तू तो है हरफनमौला, दे देना तन मन पे जख्म इतना।
न मरने पाऊँ कभी तपता रहूँ अंजान को पाने के वास्ते, चाहे युग बीत जाये कितना भी।


- डॉ.संतोष सिंह