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Hymn No. 2107 | Date: 25-Dec-2000
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हर बार गिरता हूँ जब – जब चलता हूँ तुझसे मिलने के लिये।
हर बार गिरता हूँ जब – जब चलता हूँ तुझसे मिलने के लिये।
जितना निकालना चाहा अंतर की इच्छाओं को, और बड़ा मूँह फाड़े देखा।
फिर भी गुरूर न जाने किस बात का है, टूटता है टूटने का नाम न लेता है।
दोष लाख देना चाहा जमाने को, हर दोष पाया हमारे भीतर पहले से।
अंजाम को जानता हूँ, फिर भी सरंजाम न दे पा रहा हूँ प्यार को।
लाख कसमें खायी निभाने की, जब बारी आयी अपने आप टूटते देखा।
सोचा न था इतना हैरान होना पड़ता है प्यार के रिश्ते को निभाने के वास्ते।
दास्तां मेरी वही है पुरानी, इक् बार सरेआम फिर से दम तोड़ते देखा।
गोया हमने न कभी कहा हम है पूर्ण, पर हर स्वामी का घर पाया।
साये को भी न गंवारा था साथ हमारा, कोई परम् इंसा क्यूँ कर अपनायेगा।


- डॉ.संतोष सिंह