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Hymn No. 2110 | Date: 27-Dec-2000
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मेरे आलाप को न तू समझ प्रलाप, ये तो दिल की है बात।
मेरे आलाप को न तू समझ प्रलाप, ये तो दिल की है बात।
कब किस सुर में कौन सा राग छेड़ दे, ये तो मन की है मौज।
भान किसे रहता है अपने हो या पराये गुनगुना उठता हूँ मुस्कराते।
महफिल हो या न हो, जब जब छेड़ता हूँ राग सज जाती है मेहफिल अनायास।
अंतर में तो तेरा वास है, देवर छेड़ते नगमें होता है दिल को तेरे करीबी का अहसास।
ये दास उठते बैठते देखे ये ख्वाब, जन्मों मरण से परे है तेरा मेरा साथ।
कदम मजबूरी से डग भरते है तेरे दर पर से, पर दिल तो छूट जाता है तेरे पास।
कितना भी बता लू पर कह न सकता दिल का पूरा हाल ऐसा है तेरा प्यार।
मायने न रहता है जब प्रेम का वेग बहता है, शब्द भी लय सुर छोड़के बिखर जाते है।
गाने के बाद करता है मन गाने का, तू कितनी भी दे दे तसल्ली मिलके फिर आता है मन मिलने के वास्ते।
- डॉ.संतोष सिंह
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