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Hymn No. 2117 | Date: 03-Jan-2001
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प्रभु न देगा चाहता हूँ, अपनी गल्तियसों को किसी और का नाम।
प्रभु न देगा चाहता हूँ, अपनी गल्तियसों को किसी और का नाम।
स्वीकार है हर वो अंजाम, जो तय कर रखा है तूने मेरे वास्ते।
किये हुये का कोई पश्चाताप नहीं, जब दिल ने न माना ये कोई पाप है।
मैं भाप सकता नहीं अपने कर्मों को, ये धर्म सम्मत है या असम्मत।
पर करूंगा स्वीकार तेरे हर फैसले को, आसुओं के बजाय हंसते हुये।
होगी पीड़ा किसी तन के मन को, मैं तो गाऊँगा गीत तेरी जिंदादिली के।
फरमान निकलेगा मौत का, तब भी सैय्याद होगा बैचेन तुझे चूमने को।
ऐ मालिक मत करना तू शब्दों पे मेरे भरोसा, पर सच्चे है वो आँसू जो गिरे यादों में तेरे।
मैं तो था न कभी, तो क्यू कर रहूंगा न रहना चाहूंगा।
तेरे ख्वाबों का हूँ बुलबूला, जब जी मैं आये तु तोड़ देना।


- डॉ.संतोष सिंह