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Hymn No. 2118 | Date: 04-Jan-2001
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नदियों को पाट बदलते देखा, समुद्र को पीछे हटते देखा।
नदियों को पाट बदलते देखा, समुद्र को पीछे हटते देखा।
ऐ मालिक संसार में समय के संग सबको गुजरते देखा।
तू भी आया तो निभाया इस रस्म को, अजन्मा होके जन्मा।
अमिट होके मिटा, माटी के पुतलों को जीवन रहस्य समझाने के वास्ते।
हम समझे तू खेल खेले हमारे संग, पर तू खेले खेल खुद के संग।
पहले तू अलग किया, फिर रंगने लगा अपने प्यार के रंग में।
जो रंगा तेरे प्यार के रंग में, उसको दे दिया मौलिक स्वरूप अपना।
राहे हो लाखे अनेक, अंत होता रहा है सबका सदा से एक।
चाहे जो जिस नाम से पुकार ले, तू अनामी स्वाकारे उस नाम को।
लूटने का मौका दिया सब को एकसा, पर दिलवालों ने लूटा खूब तुझे।


- डॉ.संतोष सिंह