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Hymn No. 2119 | Date: 05-Jan-2001
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तान तान के चिल्लाता हूँ निकल जाये कोई ऐसा राग जो भड़का जाये मेरे प्यार को।
तान तान के चिल्लाता हूँ निकल जाये कोई ऐसा राग जो भड़का जाये मेरे प्यार को।
होम कर देना चाहता हूँ उसमें अपने आपको, प्यार की तपन पहुँच जाये तेरे दिल तक।
तेरे बिना आबाद रहके क्या करूंगा, मनाऊँगा जश्न जो मिले बरबादी हमको तुझे पाने पे।
बड़े बड़े दावे तो न हूँ करता, पर बिछाया हूँ तेरी राह में पलक पांवडे कटे तेरी राह।
इस अदने की नहीं कोई औकात, पर कर जाऊँगा कुछ ऐसा जो आ जायेगा तू सकते में।
अब तक तू ढाता रहा कहर विरह को, पर चैन ना लेने दूंगा अपने प्यार में।
माना दाग है बहुतेरे मेरे दामन में, पर दम ना लूंगा जब तक न पहुचूँगा तेरे आंगन में।
परवाह न हैं प्राणों की जब तक बेभान न हो जाऊँ तेरे प्यार में दम न लूगा।
मैं पागल चैन न लूंगा न लेने दूंगा, कहता हूँ डंके की चोट पे नजरअंदाज करके तो देख।
बिलखना सीखा नहीं, आ गयी नौबत तो लगाऊँगा कहकहा जोर का वॉह तेरे प्यार करने के अंदाज पे।
- डॉ.संतोष सिंह
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नदियों को पाट बदलते देखा, समुद्र को पीछे हटते देखा।
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राज खुलता गया एक एक करके तुझसे मिलने का, डर निकलता गया तुझसे बिछुड़ने का।
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